Saturday, 9 February 2013

अच्छी बच्ची

माँ, मैं अच्छी बच्ची हूँ, हैं ना माँ?
तुम्हारा कहना मानती हूँ,
तुमने कहा, अजनबियों से बात मत करना,
मैं बिल्कुल नहीं करती,
माँ, मैं अच्छी बच्ची हूँ, हैं ना माँ?
तुम्हारा कहना मानती हूँ,
तुमने कहा अंधेरे मे बाहर मत जाअो,
मै सूरज ढलने के बाद बाहर नहीं जाती।
माँ, मैं अच्छी बच्ची हूँ, हैं ना माँ?
तुम्हारा कहना मानती हूँ,
तुमने कहा कपड़े ठीक से पहनो,
मैंने कभी भी ऊल-जलूल कपड़े नहीं पहने।
माँ, मैं अच्छी बच्ची हूँ, हैं ना माँ?
तुम्हारा कहना मानती हूँ,
तुमने कहा अच्छे बच्चे बड़ों की बात मानते हैं,
मैने पापा की बात मानी,
पर इस बार ऐसा क्यों लगा
कि अब मैं अच्छी बच्ची नहीं हूँ।

-मृदुल

बहन

मैं एक भाई हूँ,
मेरी एक बहन है।
पर सड़क पर चलने वाली,
दूसरों की बहनें
मेरी बहनें नहीं...
मैं उनको छेड़ सकता हूँ,
मेरे दोस्त भी उन्हें छेड़ सकतें हैं,
कोई भी उन्हे छेड़ सकता है
मुझे इससे कोई फर्क नहीं पडता

मैं ऐसा ही सोचता था......
अौर शायद सोचता रहता
पर उस रात
मेरी बहन को
जो उनकी बहन नहीं थी
उन्होने नोच डाला
छेड़ा, सताया अौर खरोंच डाला,
तोड़ा, मरोड़ा, खिलवाड़ किया
फेंक सड़क के पार दिया
मुझ जैसे कई ऐसे
ठीक मेरी तरह सोचने वाले
उसको सड़क पर देख कर चले गये.....
कुछ को दया आई, कुछ को हया
पर हाथ बढा कर मदद करने की समझ न आई।
कोई क्यों समझता,
क्योंकि वह मेरी बहन थी,
मैं भी तो अभी समझा हूँ कि
किसी अौर ने उसे क्यों नहीं बचाया?

क्योंकि वह सिर्फ मेरी बहन थी।

-मृदुल

Friday, 8 February 2013

बेटी

ट्रेन के कम्पार्टमेन्ट में,
पुराने कपडों में लिपटी,
नई जन्मी एक नन्ही सी जान,
बिना नाम, बिना पहचान,
मैंने ही छोडी थी।

कन्खियों से एक भली अौरत को उसे उठाते हुये देखा था,
उसकी भोली सूरत पर प्यार अौर तरस खाते हुये देखा था।

बेदर्द, बेरहम, बेशर्म है वो माँ,
जो इस नन्ही सी जान को छोड गई, एक आवाज आई,
कैसे इस मासूम को जन्म देकर छोड गई? एक अौरत चिल्लाई।

इन शब्दों की गूंज से मैं बहुत दूर चली आई हूँ,
पर उस दृश्य उस पल को भूल नहीं पाई हूँ।

आसान नहीं होता ममता की डोर तोडना,
दर्दनाक होता है जिन्दगी से रिश्ता तोडना।

बेदर्दी अौर बेरहमी से तो मैंने उसे बचाया है,
तीन बेटियों के बाद जिसे पाया है,
वो तीन जो जिंदा भी नहीं,
जिन्हे बाप ने जिन्दा दफनाया है।

दुआ है उसे जिन्दगी मिल तो जाए,
किसी अौर के आँगन में ही सही... खिल तो जाए।

-मृदुल

डर के साये

माँ, किसी से न कह सकती हूँ
कुछ ऐसे दर्द जो सहती हूँ....

जब घर से निकलती हूँ
सड़क पर चलती हूँ
कुछ नजरें डरा सी जाती हैं
मानो खा ही जाती हैं

कभी कोई इस तरह से छू जाता है 
कि सब मैला सा हो जाता है
फिर मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता,
किसी से बतियाने का मन नहीं करता

दिन की डरावनी परछायी रात पे छा जाती है
सपनों के भय से नींद नहीं आती है

जिंदगी की रफ्तार को रोकने का मन करता है
माँ तेरे आँचल में छुप जाने का मन करता है

-मृदुल

मेरी गुडिया

बचपन में मेरी गुडिया टूटी,
तो बहुत रुलायी फूटी।
माँ मुझको सहलाई,
फिर एक नई गुडिया दिलाई।
उम्र के पडाव पार करके, 
ससुराल की दहलीज लाँघ आई,
बचपन की गुडिया,
फिर से बहुत याद आई।
छोटे से पैर, प्यारे से हाथ,
गोल गोल आँखें, नन्ही सी नाक,
ऐसी ही गुडिया मैंने भी बनाई,
पर शायद किसी को पसन्द नहीं आई।
वो जगती, सोती अौर रोती भी थी,
वो गुडिया किसी की पोती भी थी।
फिर भी किसी ने उसे पुचकारा नहीं,
गोद में लेकर दुलारा नहीं।
मैंने उसे सीने से लगाया, प्यार किया,
सास ने कहा बेकार किया।
एक काम भी तुमसे होता नहीं,
इसे छोडो यह मेरा पोता नहीं।
तुम्हे तो हमने पहले ही समझाया था,
इसीलिये तो पिछले बार गर्भ गिराया था।
 इस बार इस नन्ही कली की बहार सही,
मैंने अपनी गुडिया को लेकर गुहार करी।
पति ने मुझे झटका,
मेरी गुडिया को पटका।
मेरी गुडिया फिर से टूटी,
मेरी सारी खुशियाँ लुटी।
अौर अब कोई सहलायेगा भी नहीं,
मेरी गुडिया मुझे लौटयेगा भी नहीं। 

-मृदुल

Monday, 4 February 2013

Every Girl Has a Story

Some stranger,
some friend,
some relative,
some uncle,
some teacher,
some student,
some driver,
some attendant,
some cop,
some guard,
some brother,
some dad,
did something bad..
every girl has a story
with something sad.

Mridual

बेटी

ट्रेन के कम्पार्टमेन्ट में,
पुराने कपडों में लिपटी,
नई जन्मी एक नन्ही सी जान,
बिना नाम, बिना पहचान,
मैंने ही छोडी थी।

कन्खियों से एक भली अौरत को उसे उठाते हुये देखा था,
उसकी भोली सूरत पर प्यार अौर तरस खाते हुये देखा था।

बेदर्द, बेरहम, बेशर्म है वो माँ,
जो इस नन्ही सी जान को छोड गई, एक आवाज आई,
कैसे इस मासूम को जन्म देकर छोड गई? एक अौरत चिल्लाई।

इन शब्दों की गूंज से मैं बहुत दूर चली आई हूँ,
पर उस दृश्य उस पल को भूल नहीं पाई हूँ।

आसान नहीं होता ममता की डोर तोडना,
दर्दनाक होता है जिन्दगी से रिश्ता तोडना।

बेदर्दी अौर बेरहमी से तो मैंने उसे बचाया है,
तीन बेटियों के बाद जिसे पाया है,
वो तीन जो जिंदा भी नहीं,
जिन्हे बाप ने जिन्दा दफनाया है।

दुआ है उसे जिन्दगी मिल तो जाए,
किसी अौर के आँगन में ही सही... खिल तो जाए।

-मृदुल कालिया भटनागर